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आज का एक्सप्लेनर: FCRA बिल पर देश-विदेश में बहस, सरकार के सामने नई चुनौती
नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (FCRA Amendment Bill) को लेकर देश ही नहीं, अमेरिका में भी बहस तेज हो गई है। अमेरिकी सांसद राइली मूर ने दावा किया कि प्रस्तावित बदलावों से चर्चों और धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों के प्रबंधन पर सरकार का नियंत्रण बढ़ सकता है। वहीं भारत सरकार का कहना है कि संशोधन का उद्देश्य विदेशी फंड के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
क्या है विवाद?
प्रस्तावित विधेयक में ऐसी व्यवस्था का प्रावधान है कि यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द, समाप्त या नवीनीकृत नहीं होता, तो विदेशी फंड से बनी संपत्तियों और धन के प्रबंधन के लिए सरकार एक नामित प्राधिकरण (Designated Authority) नियुक्त कर सकती है। आलोचकों का कहना है कि इससे धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं पर सरकारी नियंत्रण बढ़ सकता है, जबकि सरकार इसे केवल प्रशासनिक व्यवस्था बता रही है।
अमेरिका तक क्यों पहुंचा मामला?
अमेरिकी सांसद के बयान के बाद यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया। हालांकि भारत के कई विपक्षी नेताओं ने भी अमेरिकी हस्तक्षेप को भारत का आंतरिक मामला बताते हुए अनुचित कहा, भले ही वे विधेयक के कुछ प्रावधानों का विरोध कर रहे हों।
सरकार की दुविधा
बिल का समर्थन करने वाले इसे विदेशी फंडिंग की निगरानी और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए जरूरी बता रहे हैं। दूसरी ओर, कई धार्मिक और सामाजिक संगठन आशंका जता रहे हैं कि इससे उनकी कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है। ऐसे में सरकार के लिए सभी पक्षों की चिंताओं के बीच इस विधेयक को पारित कराना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।




